कलयुग का कमीना बाप-5

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अब मैं 18 साल की हो चुकी थी लेकिन मैं दूसरी लड़कियों की तरह नहीं थी, मेरी उम्र की लड़कियाँ अक्सर औरत मर्द के रिश्ते को समझने लगती हैं, लंड, चूत और चुदाई के बारे में भी जान जाती हैं लेकिन मैं इन चीजों से अन्जान थी, मैं तो यह भी नहीं जानती थी की मेरी कमर के नीचे और जांघों के बीच के जिस हिस्से से मैं रोज़ मूतती हूँ उसे क्या कहते हैं.

मैं बिल्कुल कोरी थी… मेरा मानसिक स्तर किसी छोटे बच्चे जितना ही था, क्यूंकि मम्मी पापा ने मुझे 8 साल से जैसे अकेली छोड़ दिया था और मेरा कोई दोस्त सहेली भी नहीं थी, मैं स्कूल में भी हमेशा अकेली रहती, किसी से कोई दोस्ती नहीं, कोई मेलजोल नहीं, मैं किसी से दोस्ती करने में डर महसूस करती थी।

अब मैं अकेली रहने की आदि हो चुकी थी। यही कारण है कि मेरा मानसिक विकास नहीं हो पाया। बस एक चीज जो मैं अपने आप में परिवर्तन महसूस कर रही थी वो थी कि मेरी छाती, मेरे बूब्स टेनिस के बॉल के साइज की हो गयी थी, मैं अक्सर उन्हें छू कर देखती और सोचती कि ये मेरी छाती पर क्या उठ रहा है, कहीं मुझे कोई बीमारी तो नहीं हो गयी है? कई बार मेरे मन में आया कि मैं मम्मी पापा को बताऊँ लेकिन मैं उनसे नहीं कह पायी।

एक दिन मैं सुबह सोकर उठी तो घर में महाभारत शुरू थी, हॉल में मम्मी पापा एक दूसरे को अपनी आवाज़ से दबाने की कोशिश करने में लगे हुए थे, मुझे स्कूल के लिए देरी हो रही थी तो मैं उन लोगों पर ज़्यादा ध्यान न देकर अपने बाथरूम की तरफ बढ़ गयी, बाथरूम में जैसे ही मैं अन्दर गई, लाइट जलाई लेकिन रोशनी नहीं हुई… शायद लाइट खराब हो गयी थी.

“अब मैं क्या करूँ…” मैं सोच में पड़ गयी, ‘बिना नहाये स्कूल में कैसे जाऊँगी?’ मैंने अपने आप बड़बड़ाते हुए बोली।
“क्यूं न मैं पापा के बाथरूम को यूज कर लूं!” मुझे यही ठीक लगा।

मैं अपने कपड़े उठा कर पापा के बाथरूम पहुँच गयी और अपने कपड़े उतार कर बाथ लेने लगी. मैं बचपन से ही नंगी नहाती आयी थी, मैं पापा के बाथरूम में भी अपने सारे कपड़े उतार कर नंगी हो गयी और शावर लेने लगी।
मैं अपने बदन पर गिरते पानी की फुहार को अपने हाथों से पूरे बदन पर मलने लगी। फिर शैम्पू अपने हाथों में लेकर बालों पर लगने लगी, मैं अपनी आँखें बंद किये शैम्पू लगा रही थी.

कुछ देर बाद जैसे ही मेरी आँख खुली, मेरी नज़र दरवाज़े पर गयी, जहाँ पापा खड़े मुझे फटी फटी आँखों से देख रहे थे। मेरे दोनों हाथ अभी भी मेरे बालों में फंसे हुए थे।

मैं पापा को इस तरह घूरते देख कर बहुत डर गयी- सॉरी पापा… मेरे बाथरूम में लाईट नहीं जल रही है, इसलिए मैंने आपका बाथरूम यूज कर रही हूँ.
मैं पापा की डांट से बचने के लिये उनके पूछने से पहले बोल पड़ी।

“ओके… कोई बात नहीं बेटा!” पापा ने हकलाते हुए कहा, उनकी नज़र मेरे चेहरे से नीचे उतर कर मेरी छाती पर ठहर गयी।
पापा की बात सुनकर मैंने राहत की साँस ली और फिर से नहाने लगी। पापा अभी भी दरवाज़े पर खड़े थे, उनके बदन पर सिर्फ एक ट्रॉउज़र था, ऊपर से वो बिल्कुल नंगे थे।

“क्या हुआ पापा?” मैंने पापा से पूछा।
“पिंकी… क्या मैं तुम्हें नहला दूँ?” पापा प्यार से मुझे देखते हुए बोले।
वो कभी भी इतने प्यार से बात नहीं करते थे। मुझे थोड़ी हैरानी हुई.

“तुम्हारे बदन में कितना मैल जमा हुआ है, लगता है तुम्हें ठीक से नहाना नहीं आता!” वो अंदर आते हुए बोले।
मैं पापा को देखने लगी, पापा पहले से बिल्कुल बदल गए थे, उनके चेहरे में जहाँ पहले ग़ुस्सा और उदासी होती थी, अब उसमें एक अनोखी चमक और ख़ुशी दिखाई दे रही थी, पहले उनके शब्दों में जहाँ कड़ वाहट के सिवाये कुछ न होता था, अब उनमें प्यार और मिठास थी। और सबसे बड़ा बदलाव जो मुझे दिखाई दिया वो उनकी कमर के नीचे और जांघों के बीच में था, वहां पर कुछ फूला हुआ लग रहा तो मेरा सारा ध्यान वहीं पर जाकर अटक गया।

मैं उनकी जांघों के बीच से नज़र हटाकर पापा को देखने लगी, अब वो बिल्कुल मेरे पास खड़े थे।
“क्या सोच रही है? मैं तुम्हें आराम से नहलाऊंगा. प्रोमिस!” पापा गर्म साँस छोड़ते हुए मुझसे बोले।
“ठीक है पापा…” मैं धीरे से पापा से बोली।

पापा बिना देर किये साबुन उठाकर मेरी पीठ पर लगाने लगे, उनका हाथ साबुन लगाते हुए जब मेरी गांड तक पहुंचा तो पापा के हाथों में थरथराहट सी हुई, लेकिन मैं इसका कारण नहीं जान पायी, अब पापा मेरे चूतड़ों पर हाथ चलाने लगे, उन्हें जोर से दबाने और सहलाने लगे.

अचानक पापा मेरे आगे आ गए और अपने हाथ मेरी छाती पर रख कर साबुन लगाने लगे, पापा ने साबुन लगाते हुए मेरी छाती के एक उभार को अपने हाथ में भर लिया।
“आह्ह…” पापा का हाथ पड़ते ही मेरे मुंह से एक आह निकल गयी।
“क्क्या हुआ… दर्द हुआ क्या?” पापा अपना हाथ हटाते हुए बोले।
“नहीं पापा… दर्द नहीं हुआ… वो तो वो तो…” मैं इससे आगे बोल ही नहीं पाई।
“वो तो क्या…” पापा मेरी आँखों में देखते हुए बोले।
“पता नहीं पापा… मेरे मुंह से अपने आप ही आह निकल गयी।” मैं पापा को देखती हुई बोली।

पापा मेरी बात सुनकर फिर से अपना हाथ मेरी उभार पर रख दिए और धीरे धीर सहलाने लाग, उनके हाथों के छुअन से मेरे पूरे बदन में एक गुदगुदी सी फैल गई, जो मेरे लिए बिल्कुल नया अनुभव था, मैं नहीं जान पाई कि जिन उभारों को मैं रोज़ छूती थी, उन्हें पापा के द्वारा छुए जाने से मुझे इतना मजा क्यों आ रहा है।

“पिंकी… कैसा लग रहा है तुम्हें?” पापा मेरे उभारों को धीरे से दबाते हुए बोले।
“बहुत अच्छा लग रहा है पापा…” मैं नहीं जान पाई क्यों… पर ये कहते हुए मेरा चेहरा शर्म से लाल हो गया.

अब पापा दोनों हाथों से मेरी छाती को दबाने लगे, मेरी आँखें अपने आप बंद होती चली गई, मैं अपनी छाती आगे करके पापा से अपने उभारों को दबवाने लगी।

अचानक पापा का एक हाथ मेरे उभार से फिसल कर मेरी जांघों के नीचे जहाँ से मैं पेशाब करती थी, वहां पहुँच गया। पापा अपने हाथ से उस जगह को सहलाने लगे और मेरे पूरे बदन में एक मस्ती सी दौड़ गयी, मेरी जाँघें अपने आप सटने लगी और मैं पापा से लिपटती चली गई।

कुछ देर मेरे उरोज को दबाने और चूत को सहलाने के बाद पापा अलग हुये। उनका अलग होना मुझे अच्छा नहीं लगा, मैं पापा से और प्यार चाहती थी लेकिन पापा मेरी भावनाओं को दरकिनार कर अपने कपड़े उतारने में व्यस्त थे।

जैसे ही वो पूरे नंगे हुए मेरी आँखें हैरत से फटी की फटी रह गयी, मेरी नज़र उनके जांघों के बीच जम गई।
“क्या देख रही है?” पापा मुझे अपनी ओर देखते पाकर मुझे बोले- इसे लंड कहते है… यह मरदों का सबसे कीमती अंग होता है।
मेरी दृष्टि अभी भी उनके लंड पर चिपकी हुई थी।

अचानक पापा मेरे क़रीब आए और मेरा हाथ पकड़ कर अपने लंड पर रख दिया, मैं उनके लंड को सहलाने लगी।
फिर पापा मेरे आगे आये और मुझे अपने से चिपका लिया, उनका लंड मेरी कमर पर चुभने लगा। पापा एक हाथ मेरे बूब्स पर रख कर दबाने लगे और दूसरे हाथ से मेरी चुत सहलाने लगे, मेरी आँखें मस्ती में बंद होने लगी।

कुछ देर उस अवस्था में रहने के बाद पापा ने अपने हाथ को मेरे जांघों के बीच जोड़ पर जमा कर मुझे ऊपर खींच लिया। उनके ऐसा करने से मैं हवा में उठ गयी थी। उनका दूसरा हाथ अभी भी मेरे बूब्स पर था।
कब उनका लंड मेरे दोनों जांघों के बीच आ गया था जो अकड़ कर कभी कभी मेरी चुत को छू जाता था।

पापा अपने हाथों से धीरे धीरे मेरी चुत सहलाते रहे और दूसरे हाथ से मेरे बूब्स बारी बारी दबाते रहे। मेरे मुंह से सिसकारियां निकलने लगी। मुझे जो मजा आज मिल रहा था वो कभी नहीं मिला था, मैं मन ही मन पापा को थैंक्स बोल रही थी।

“पिंकी अपनी दोनों जांघों को सटा लो!” अचानक पापा की आवाज़ से मैंने आँख खोली।
मैंने वैसा ही किया, अपनी दोनों जांघों को आपस में सटा लिया। दोनों जांघों को आपस में सटाने से पापा का लंड मेरे जांघों के बीच दब गया था।

पापा धीरे धीरे आगे पीछे होने लगे। उनके आगे पीछे होने से उनका लंड मेरी जांघों में रगड़ खाने लगा। पापा आगे पीछे होते हुए मेरी चुत और बूब्स भी मसलते जा रहे थे। साथ ही मेरी गर्दन और गालों को भी चूम रहे थे।

कुछ देर बाद पापा ने मुझे फर्श पर खड़ा कर दिया और मुझे देखते हुए अपना लंड जोर जोर से हिलाने लगे।
उनका हाथ बहुत तेजी से उनके लंड पर आगे पीछे हो रहा था।

मैं हैरान थी कि पापा यह क्या कर रहे हैं, मैं बस फटी फटी आँखों से उन्हें देखती रही।
ऐसा करते हुए वो बहुत जोर जोर से हिल भी रहे थे और उनका चेहरा भी बनने बिगड़ने लगा था। उनकी नज़रें कभी मेरे बूब्स पर तो कभी मेरी चुत पर तो कभी मेरे चेहरे पर फिसल रही थी।
अचानक उनके मुंह से ‘उम्म्ह… अहह… हय… याह…’ की आवाज़ें निकलने लगी और फिर उनके लंड से एक अचानक सफ़ेद धार बाहर निकली और सीधे मेरे पेट पर और जांघों में आकर लगी।

मैं आश्चर्य से उस चिपचिपी चीज को हाथ लगा कर देखने लगी, वो काफी गरम था।
मैंने पापा की ओर देखा, वो फर्श पर बैठे हाँफ रहे थे।

कुछ देर बाद पापा उठे और शावर चला दिया और मुझे नहलाने लगे। मैं उस दौरान भी पापा से सटने की भरसक कोशिश करती रही।

15 मिनट में हम दोनों ही नहा कर तैयार हुये। मैं जब तक अपने कपड़े पहन कर तैयार हुई, पापा भी कपड़े पहन चुके थे।
मैं उन्हें ही देख रही थी।

उनके कपड़े पहनने के बाद मैं उनसे जाकर लिपट गई, उन्होंने मेरे माथे को चुम लिया- पिंकी… तू यह बात अपनी मम्मी को मत बताना!
“क्यों पापा?”
“अगर उसे मालूम हो गया तो वो फिर कभी तुझे मेरे साथ नहाने नहीं देगी।” वो धीरे से फुसफुसाए।
“आप चिंता मत कीजिये पापा, मैं मम्मी को ये बात कभी नहीं बताऊँगी… पर आप रोज़ मुझे नहलाएंगे न?”
“हाँ रोज़ नहलाऊँगा, अब तू अपने कमरे में जा!”

कमरे में जाने वाली बात सुनकर मैं उदास हो गयी- पापा, मैं कुछ देर और आपके साथ रहना चाहती हूँ, आप मुझे बहुत अच्छे लगते हो पापा!
“तुम भी मुझे बहुत अच्छी लगती हो। पर बेटी ये सब तुम्हारी मम्मी से छिपा कर करना होगा। तुम्हारी मम्मी मुझे खुश रहते नहीं देख पाती है। जब देखो मुझसे लड़ने आ जाती है।”
ठीक है पापा… आप जैसा कहेंगे मैं वही करुँगी।” मैं बोलकर जाने लगी।

पर मेरा मन जाने को नहीं कर रहा था। मैं जैसे ही मुड़ने को हुई पापा ने मेरा हाथ पकड़ लिया और मुझे अपनी छाती से चिपका लिया। मैं उनकी छाती में किसी गुड़िया की तरह सिमटती चली गई।

पापा मुझे अपने छाती से चिपकाये हुए मेरी ओर देखने लगे। फिर अचानक अपना चेहरे झुकाकर मेरे होंठों को चूसने लगे।
मुझे उनके होंठों का स्पर्श अंदर तक गुदगुदाता चला गया। वो एक हाथ से मेरे बूब्स भी मसलते रहे, फिर मुझसे अलग हुए और जाने को कहा।

जब मैं जाने लगी तो उन्हें मेरी गांड में अपना हाथ घुमाया और मुस्कुराकर मुझे देखने लगे।
मैं भी जवाब में मुस्कुरा दी।

कहानी जारी रहेगी।
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