मेरे पति मुझे जुए में हार गए- 2

हस्बैंड फ्रेंड सेक्स स्टोरी में पढ़ें कि शादी के बाद से मेरी चूत की प्यास नहीं बुझी थी। अपने पति के दोस्त के साथ मैंने यह हसरत कैसे पूरी की, मजा लें.

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दोस्तो, मैं अंजलि शर्मा एक बार फिर से आप लोगों के सामने हाजिर हूं अपनी प्यासी चूत की कहानी लेकर!
हस्बैंड फ्रेंड सेक्स स्टोरी के पहले भाग
पति के दोस्त के सामने मुझे नंगी होना पड़ा
में आपने देखा कि मेरे पति संजीव अपने दोस्त पीयूष से मुझे जुए में हार गए।

पीयूष मुझे चोदने के लिए रूम में ले जाने लगे और वहां जाकर बोले कि वो मेरे पति को सबक सिखाना चाहते थे।
वो बिना चोदे जाने लगे तो मैं खुद चुदने के लिए तड़प उठी। फिर उन्होंने मुझे नंगी को उठाया और बेड पर ले आए।

अब आगे हस्बैंड फ्रेंड सेक्स स्टोरी:

पीयूष जी खुद भी बेड पर आ गए और मेरे ऊपर चढ़ गए।
मैंने पीयूष जी को अपनी बांहों मे भर लिया और मैंने उनके चेहरे और जिस्म पर मेरे गुलाबी होंठों से चुम्बनों की झड़ी लगा दी।

मैं उन्हें पागलों की तरह उनके माथे पर, उनके गालों पर चूमे जा रही थी और मेरा एक हाथ उनके बालों को सहला रहा था।
पीयूष जी ने मेरे होंठों पर किस करते हुए मुझसे कहा- अंजलि तुम बहुत खूबसूरत हो। तुम्हारा बदन किसी जलपरी की तरह भरा हुआ है तुम्हारे यह गोल मटोल तने हुए बूब्स तुम्हारी सुंदरता को और बढ़ाते हैं।

इस पर मैंने भी कहा- पीयूष जी, आज ये वक़्त आपका है। आप मुझे महका दो। मुझे बहका दो। मेरे सपनों को हकीकत में बदल दो और मेरी जिस्म की प्यास मिटा दो, जिसके लिए मैं पिछले सात महीनों से तड़प रही हूं। मेरा अधूरा प्यार पूरा कर दो आप! आज के लिए मैं सिर्फ और सिर्फ आपकी हूं।

मेरा बदन पहले से ही कसा हुआ था। मेरी गांड, मेरे चूचे, मेरी कमर पर बाल, मेरी बाजुएं सब कुछ … जिसकी वजह से मैं सुंदरता की धनी पहले से ही थी।
पीयूष जी की बांहों में मेरी जवानी सिमटी हुई थी। उन्होंने मुझे कसकर अपनी बांहों में दबोच रखा था।

मेरे बदन के हर अंग से सुंदरता का अमृत टपक रहा था।
जो परफ्यूम मैंने लगाया हुआ था उसकी वजह से हम दोनों की सांसें भी महक उठी थीं।

पीयूष जी ने अपने होंठ मेरे भरे हुए रसीले होंठों पर रखे और उनसे बून्द बून्द करके अमृत चूसने की कोशिश करने लगे।

मैं भी उनका भरपूर साथ दे रही थी।
पीयूष जी के दोनों हाथ मेरे बूब्स के साथ खेलना शुरू हो गए थे।

उनकी उंगलियों का स्पर्श मेरी निप्पलों को सख्त होने पर मजबूर कर रहा था।

वो अपने नाखूनों से मेरे निप्पलों पर नोंच रहे थे जो कि मुझे और कामुकता पर ले जा रही थी।

उनकी यह कला इतनी मादक थी कि मैं उनकी बांहों में बिन पानी मछली की तरह मचलने लगी जिसका वो फायदा उठा रहे थे।

दोनों महकते हुए बदनों के बीच अब गर्मी पैदा होना शुरू हो गई थी। हमारा बदन पसीने की बूंदों से भीगना शुरू हो गया था; हम दोनों की आँखों में सिर्फ वासना के डोरे पड़े हुए थे।

हम दोनों बस एक दूसरे की प्यास बुझाने में लीन थे। हमारी चूमा चाटी को चलते हुए 10 मिनट हो चुके थे।

पीयूष जी मेरे बूब्स पर आ गए और अपने बड़े बड़े हाथों को मेरे बूब्स पर रख कर उन्हें पुरजोर तरीके से मसलने लगे।

मैं कमरे में आह भरने लगी थी और सिसकारियाँ निकालने लगी।
मैंने अपने नाजुक से होंठों को अपने दांतों के बीच दबाया और उन्हें कटाने लगी।

हम दोनों की कामुकता एक अलग ही तूफ़ान ला चुकी थी।
अब तक पीयूष जी मेरे बूब्स पर आकर मेरे निप्पल्स को चूसने लगे और मेरे बूब्स दबाने लगे।

पीयूष जी मेरे निप्पलों को चूसते हुए उनमें से दूध निकालने लगे और मेरे बूब्स मसलने लगे।
मैंने भी बेड पर उन्हें अपने जिस्म में समेट रखा था।

इसके बाद मैंने उनका का कोट उतार दिया और उनकी टाई भी उतार दी।
मैंने धीरे धीरे उनकी शर्ट के सारे बटन खोल दिए और शर्ट भी उतार दी।

वो अभी भी मेरी बांहों में थे। मैंने उन्हें अपनी बांहों से अलग किया और उनके जूते भी उतार दिए और साथ ही उनकी बेल्ट खोल कर उनकी पैंट भी उतार दी।

उनका लंड उनके अंडरवियर में उफान मार रहा था और मेरी चुदाई करने के लिए एकदम तैयार था।
मगर मैं अभी चाहती थी कि पीयूष जी मेरे बदन के साथ और खेलें।

मैंने उन्हें फिर से अपनी बांहों में भर लिया।

वो अपने होंठ मेरी गर्दन के पीछे रख मेरे गले को चूमने लगे। वहां वो मुझे चूमे जा रहे थे।

वासना इतनी भड़क चुकी थी कि हम दोनों पसीने में भीगे हुए थे। मेरी गर्दन के पीछे से पसीने की बूंदें शुरू होती हुईं मेरे बूब्स के क्लीवेज से होती हुई मेरी नाभि में समा रही थी।

पीयूष जी मेरे पसीने की बूंदों को गर्दन से चूसते हुए धीरे धीरे मेरे सीने पर आ गए।
वो मेरे जिस्म से जो अमृत की बूंदें पसीने के रूप में टपक रही थीं उन्हें पीते हुए मेरे बूब्स तक आ गए।

उन्होंने अपनी गर्दन मेरे बूब्स पर रखी और बूब्स के क्लीवेज में से जो अमृत की बूंदों की धार बहती जा रही थी उन्हें पीने की कोशिश की।

मगर वो इस कोशिश में नाकाम रहे।
मेरे बूब्स का क्लीवेज काफ़ी गहरा है इसलिए उनके होंठ वहां तक नहीं पहुंच पा रहे थे।

मैंने पीयूष जी की मदद करते हुए उनके दोनों हाथ मेरे बूब्स पर रखे और मेरे दोनों बूब्स को पीयूष जी ने खोल दिया।

अब मेरा क्लीवेज बड़ा हो चुका था जिसमें उनके होंठ मेरे क्लीवेज में आराम से युद्ध कर सकते थे और अमृत की बूंदों का आनंद ले सकते थे।
पीयूष जी ने अपने होंठ मेरे क्लीवेज में रखे और वहां से चूसने लगे; उन पसीने की बूंदों को पीने लगे।

मैं बहुत गर्म हो चुकी थी और अपनी दोनों टांगों को उनकी पीठ पर रख कर उन्हें अपनी ओर दबा रही थी।
मैंने अपने दोनों हाथ उनकी पीठ पर रखे और अपनी सारी उंगलियों के नाखूनों को उनकी पीठ में चुभो दिया और अपनी ओर उन्हें भींचने लगी।

पीयूष जी मेरे क्लीवेज से धारा को चूसते हुए मेरी नाभि पर आ गए और मेरी नाभि को चूमने लगे।

मैं इस वक़्त एक अलग जन्नत का अहसास कर रही थी जिसको मैं शब्दों में बयां नहीं कर सकती।

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उन्होंने पसीने की एक एक बूंद को अमृत की तरह चूस लिया था।

हमारा फोरप्ले चलते हुए लगभग एक घंटा हो चुका था।
मेरी चूत अब तक अपना रस छोड़ने को तैयार हो गई थी मगर मैंने खुद को संभाला।

पीयूष जी ने मुझे झट से पलट दिया और मेरी पीठ अब उनके सामने थी।
वो अपनी एक उंगली मेरी गर्दन से फेरते हुए मेरी कमर की गहराई तक आ गए।
इस हरकत ने मुझे और जोश में ला दिया।

पीयूष जी ने अपने होंठ मेरे पीठ पर रखे और जगह जगह मेरी पीठ को चूमने लगे।

इन सात महीनों में मुझे ऐसे सुख की प्राप्ति नहीं हुई थी अभी तक!
संजीव के साथ तो बिल्कुल भी नहीं!

कुछ देर बाद मैं अब पीयूष जी के लंड को चूसना चाहती थी इसलिए पलट गई।

मैंने उनके अंडरवियर पर हाथ रखा और उसे खींचती हुई उनकी गठीली जांघों से नीचे ले आयी और उसे उतार कर नीचे फेंक दिया।

मैं उनके भीमकाय लंड को देख कर अचंभित थी और मेरे चेहरे का रंग उड़ा हुआ था।

मुस्कान के साथ मेरी नज़रें उनके बदन को निहार रही थीं। उनका लगभग 7 इंच का लंड हवा में उफान मार रहा था।
मैंने पीयूष जी के लंड को अपने हाथों में ले लिया और उसे अचंभित नज़रों से देखने लगी।

फिर बिना कुछ सोचे समझे मैंने लंड को अपने मुँह में लेना चाहा मगर पीयूष जी ने मुझे रोक दिया और बोले- ऐसे नहीं, जाओ पहले किचन से बटर ले लाओ।
मैं खुश होती हुई बिना डरे ही नंगी नीचे आ गई जहाँ मेरे पति संजीव बेहोश पड़े हुए थे।

मैंने किचन से बटर का डब्बा निकाला और साथ ही जो मेरे कपडे़ पड़े हुए थे- ब्रा, पैंटी, साड़ी वगैरह उन्हें भी ऊपर ले आयी।
रूम में मैंने गेट को थोड़ा सा भेड़ दिया। मैंने सारे कपड़े वहीं फर्श पर पटक दिए।

बटर का डब्बा लेकर मैं बेड पर आ गई। पीयूष जी ने मुझे दोबारा बेड पर पटक दिया और मेरी दोनों टाँगें खोल दीं और घुटनों के बल बैठकर पीयूष जी ने मेरी चूत की बाली को खोल दिया।

वो बटर के डब्बे से मक्खन निकाल कर मेरी चूत पर लगाने लगे। उनके हाथों का स्पर्श बड़ा ही कमाल था।
मेरी चूत अभी से जोर जोर से हांफ रही थी।

पीयूष जी ने बटर अच्छे से मेरी चूत पर मल दिया और फिर नीचे झुके।
उन्होंने मेरी चूत को सूंघना चाहा मगर अब मेरी चूत में से सिर्फ बटर की खुशबू आ रही थी।

उन्होंने अपनी उंगलियों से मेरी चूत का दरबार खोला और अपनी जीभ मेरी चूत की दोनों पंखुड़ियों पर रख दी।

फिर उन्होंने अपनी जीभ मेरी चूत में घुसाई और फिर मेरी चूत का दरबार वापसी बंद कर दिया।
पीयूष जी की आधी जीभ मेरी चूत में थी। वो अंदर ही अंदर मेरी चूत में अपनी जीभ हिला रहे थे जिसकी वजह से मुझे बहुत मजा आ रहा था।

कुछ देर बाद पीयूष जी मेरी चूत पर किसी दीवाने की तरह टूट पड़े और अपने होंठों से मेरी चूत को प्यार करने लगे।
मैं अब आहें भरने लगी थी- आह्ह पीयूष … आह्ह … आह्ह … पीयूष।

वो मेरी चूत में अपनी जीभ से कलाबाजी दिखा रहे थे और मुझे मजा दे रहे थे।
मैं भी अपने दोनों हाथ उनके लम्बे बालों में फंसाकर उन्हें मेरी चूत की तरफ खींचने लगी।
पीयूष जी बहुत मजे से मेरी चूत के साथ खेल रहे थे।

मेरी चूत एकदम चिकनी हो गई थी। उन्हें मेरी चूत चूसते हुए 20 मिनट हो गए थे। वो कभी मेरी चूत के दाने से खेलते तो कभी मेरी चूत अपने लबों से काटते।

मैं बहुत कामुक हो चुकी थी। इस वजह से मेरी चूत तो पहले ही झड़ने को तैयार थी।
मेरा बदन अकड़ने लगा और मैंने पीयूष जी से कहा- मैं झड़ने वाली हूं।

कुछ देर पीयूष जी ने मेरी चूत को और चूसा और मैं उनके होंठों पर ही झड़ने लगी।
उन्होंने जीभ डाल डाल कर मेरा सारा अमृत निकाल दिया और मेरे अमृत की एक एक बून्द को चूस गए।

उन्हें मैंने अपनी बांहों में दबोच लिया और उनके माथे पर अपने होंठों से चूमने लगी पीयूष जी का लंड नीचे मेरे पेट पर टच हो रहा था मैंने उसे अपने हाथ में लिया और सहलाने लगी।
मैंने पीयूष जी की आँखों में देखा।

हम दोनो एक दूसरे में डूबने के लिए तैयार थे। मैंने उनके होंठों पर होंठ रखे और दोबारा से चूसने लगी, साथ ही एक हाथ से उनके लंड को सहलाने लगी।

मैंने पीयूष जी को अब बांहों से अलग किया और खुद अब घुटनों के बल बैठ गई, मैंने उनको बेड पर लेटा दिया था।

वो बोले- पहले बटर लगा लो। फिर चूस लेना।
मैंने कहा- मुझे बटर की जरूरत नहीं है। जो बटर उसमें से निकलेगा मुझे वो चूसना है।
वो बोले- ठीक है।

उनका लंड मेरे पति की अपेक्षा काफी मजबूत, बड़ा और मोटा था जो कि आज से मेरा गुलाम बनने जा रहा था।
एक अजनबी मर्द के लंड को देख कर मेरे मुँह में पानी आ रहा था।

मैंने आज सारी शर्मा और हया अपने कपड़ों के साथ उतार फेंकी थी।
आज रात मैं 7 महीने से बेचैन चुदाई का मजा लेना चाहती थी।

मैं अपनी गर्दन पीयूष जी के लंड के पास ले गई और मैंने अपने रसीले होंठ उनके लंड के टोपे पर रख दिए।

लंड के टोपे को मैंने एक बार चूसा जिसमें से बड़ी मादक महक आ रही थी।
मैंने अपने होंठों के बीच उनके लंड के टोपे को दबा लिया फिर मैंने अपने दांतों से उनके टोपे पर धीरे से काटा।

पीयूष जी भी महक उठे।
उनका लंड अब जोर जोर से हिल रहा था।

मैंने फिर उनका लंड धीरे धीरे अपने रसीले होंठों से चूसते हुए पूरा अंदर ले लिया। मैं उनके लंड के सुपारे को जोरदार तरीके से चूसने लगी।

मैं उनके टट्टों को हाथों से सहलाने लगी। वो आहें भरने लगे थे। अब उनके हाथ मेरी गर्दन पर आ गए और वो लंड को मेरे मुंह में दबाने लगे थे। मेरे मुंह की चुसाई उनके लंड से अब बर्दाश्त नहीं हो रही थी।

लगभग 10-15 मिनट मुझे उनका लंड चूसते हुए हो गए थे। मैंने उनके लंड को अपने मुँह से बाहर निकाला और उस पर अच्छे से बटर लगा दिया। मैंने उन्हें दोबारा से वासना से भरी नज़रों से देखा।

वो भी मुझे ही देख रहे थे। उनकी आँखों में मेरे लिए प्यार की चमक साफ दिखाई दे रही थी। उन्होंने मुझे लंड को दोबारा से मुँह में लेने के लिए इशारा किया और उनके इशारे को समझते हुए मैंने उनका लंड दोबारा से अपने मुँह में ले लिया।

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उनके लंड पर लगे हुए मक्खन को चाटते हुए मैं उनके लंड को चूसने लगी। पीयूष जी भी मेरा भरपूर साथ दे रहे थे। मानो के जैसे हम दोनों दो जिस्म और एक जान हो गए हों।

इसी तरह मैंने उनके लंड को 10-15 मिनट और चूसा। लगभग मैंने उनके लंड के साथ आधा घंटा चुसाई का खेल खेला। पीयूष जी ने अपना लंड मेरे मुँह से बाहर निकाल लिया और मुझे बेड पर सीधी लेटा दिया।

अब वो मेरी दोनों टांगों के पास आ गए और उन्होंने मेरी दोनों टाँगें खोल कर अपने दोनों कंधों पर रख लीं। मुझे समझ आ गया था कि ये कदम मेरे चरम सुख की प्राप्ति की ओर बढ़ रहे हैं। अभी मेरी जमकर ठुकाई होने वाली है।

पीयूष जी का लंड और मेरी चूत पहले से ही मक्खन की वजह से चिकने हो चुके थे।
उन्होंने अपना भीमकाय लंड मेरी मखमली चूत पर रखा और धीरे से एक धक्का लगाया जिससे उनके लंड का टोपा मेरी चूत की कलियों को खोलता हुआ पहली बार मेरे जिस्म में प्रवेश हुआ।

मैं थोड़ी सी शरमाई जैसे कि मानो कि कोई नयी नवेली दुल्हन अपने पति से सुहागरात पर पहली बार चुद रही हो।
उन्होंने एक और जोरदार धक्का मारा और चूत और लंड दोनों चिकने होने के कारण उनका पूरा लंड मेरी चूत को फाड़ता हुआ अंदर तक उतर गया।

चूत और लंड का मिलन हो गया जिसकी वजह से मैं चीखी- आह … पीयूष जी … धीरे करिये।

उन्होंने अपना पूरा लंड अंदर तक डाल दिया था और धक्के लगाने शुरू कर दिए।
वो अब जमकर मेरी चूत मे अपने लंड से धक्के लगाने लगे और मैं भी चीखती हुई उनका साथ देने लगी- आह्ह … पीयूष जी … आह्ह … आआईई … आह्ह … उईई … आह्ह।

कमरा मेरी कराहटों से गूंज उठा था।
मेरी आवाजों से वो भी जोश में आ चुके थे; वो लगातार अपने लंड से मेरी चूत में धक्का पेल अपना लंड पेले जा रहे थे।

लगभग 15-20 मिनट उन्हें मेरी चुदाई करते हुए हो गए थे और उतनी देर में संजीव का सब कुछ खत्म हो जाता था।
मगर यहाँ मुझे चरम सुख की प्राप्ति हो रही थी; पीयूष जी धक्के लगा रहे थे।

उन्होंने मेरी दोनों टांगों को अपने कंधे पर रखा हुआ था और अपने दोनों हाथों से मेरी दोनों टांगों को पकड़ा हुआ था।
मैं पीयूष जी के धक्के लगातार झेल रही थी। धक्कों की वजह से मेरे बूब्स हिल भी रहे थे।

मेरे पैरों में जो पायल थी उसके घुंघरुओं में से छन-छन की आवाजें आ रही थीं और पीयूष जी मेरी टांगों को पकड़ कर मेरी दमदार ठुकाई करने में लीन थे।

पीयूष जी ने धक्के लगाते हुए अपनी आंखें मेरी आँखों से मिलाईं।
हम दोनों चुदाई और वासना में पूरी तरह डूब चुके थे।

मैं पीयूष जी को देख कर शर्मा रही थी और पानी पानी हुई जा रही थी।

वो मेरी दोनों टांगों को मेरे चेहरे की ओर मोड़ते हुए उन्हें मेरे चेहरे तक ले आये और धक्के लगाने लगे।
अब मेरी चूत के साथ साथ मेरी दोनों टांगों में भी दर्द हो रहा था।

हम दोनों का चेहरा एक दूसरे से सिर्फ 3-4 इंच की दूरी पर था।
मैं शर्म के मारे पीयूष जी से नज़रें चुरा रही थी।
पीयूष जी बोले- मेरी आँखों में देखो।
उनके धक्के लगातार चालू थे।

मेरे मुँह से अभी इस वक़्त सिसकारियों की आवाजें कम हो गई थीं।
मैंने दोबारा उनकी आँखों में आँखें डालीं और उन्होंने अपने दोनों होंठ मेरे होंठों पर रख कर धक्के को जोरदार मारा।

मैं चीखना चाहती थी मगर होंठ पर होंठ थे इसलिए कुछ नहीं कर पायी। हम दोनों एक दूसरे के होंठों को चूस रहे थे।

पीयूष जी ने मेरी दोनों टाँगें मोड़ी हुई थीं और खुद उन पर चढ़े हुए थे और नीचे से अपने लंड से धक्के लगा रहे थे।

मुझे अब तक चुदते हुए काफी देर हो चुकी थी और मेरा बदन अकड़ने लगा था; मैं अपने चरम सुख को प्राप्त करने के लिए तैयार थी।
मैं बेडशीट को पकड़ कर अपनी ओर खींचने लगी।

पीयूष जी के धक्के लगातार जारी थे और कुछ ही मिनटों के बाद मैंने अपना अमृत रस उनके लंड पर ही त्याग दिया और उनका लंड पूरा मेरे रस से भीग चुका था।

पीयूष जी अभी भी मेरे ऊपर चढ़े हुए थे और धक्कम पेल मुझे चोद रहे थे।

मैं आहें भर रही थी जिसके वजह से शेरू भौंकने लगा।
मैंने उसे चुदते हुए ही आवाज लगाई और वो कुछ देर बाद चुप हो गया।

शेरू मुझे पहले भी संजीव से चुदते हुए काफ़ी बार देख चुका है।

कुछ मिनट और चोदने के बाद पीयूष जी का बदन भी अकड़ने लगा, वो भी अपना अमृत निकालने के लिए तैयार हो चुके थे।
वो पूछने लगे- अंदर ही निकाल दूं?
मैंने कहा- नहीं, मुझे इन्हीं अमृत बूंदों का तो इंतजार है। इन्हें मैं पीना चाहती हूं।

पीयूष जी ने अपना लंड मेरी चूत से बाहर निकाल लिया और खुद घुटनों के बल बैठ गए और मुझे अपनी कुतिया बना कर अपने लंड के पास ले आये।
जैसे एक कुतिया बैठी होती है … ठीक उसी तरह मैं पीयूष जी के लंड के पास ही बैठी थी।

उन्होंने अपना लंड मेरे मुँह में दे दिया और मेरे बाल पकड़ कर मेरे मुँह में धक्के लगाने लगे।

कुछ ही मिनट धक्के लगाने के बाद पीयूष जी ने अपनी अमृत बूंदों का प्याला मेरे मुँह में छलका दिया।

उनके लंड से निकल रही अमृत की बून्द एक एक करके मेरे गले से नीचे उतरती चली गई मानो जैसे मुझे सच में अमृत का अहसास हुआ हो।
मेरे पति पिछले सात महीनों में एक भी बार इनता अच्छे से नहीं झड़े थे।

पीयूष जी का लंड इतना वीर्य निकाल रहा था कि मेरी प्यास बुझने लगी।
मेरा गला अंदर से तर हो गया।

पूरा झड़ने के बाद उन्होंने मेरे मुंह से लंड को बाहर निकाल लिया।

हम दोनों निढाल होकर बेड पर लेट गए और एक दूसरे से चिपक गए।

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हस्बैंड फ्रेंड सेक्स स्टोरी अगले भाग में जारी रहेगी।