हसीन चाची की प्यासी चूत की चुदाई कर दी-1

दोस्तो.. मेरा नाम पंकज है.. दिल्ली में अपने पेरेंट्स के साथ रहता हूँ। मेरी आयु बेशक 18 साल की है.. लेकिन जिम जाने की वजह से मेरा बदन पूरा 25-26 साल के हट्टे-कट्टे नौज़वान की तरह लगता है।
मैं अपनी कहानी आप लोगों को अन्तर्वासना.कॉम पर डाल कर बताना चाहता था.. पर वो क्या है ना दोस्तो कि पढ़ाई की वजह से समय नहीं मिलता।

मेरी कहानी बिल्कुल सच है, बात तब की है.. जब मैं बारहवीं क्लास में पढ़ता था। हमारा मकान और चाचा का मकान दोनों 3 किलो मीटर की दूरी पर था। पहले हम सभी लोग एक साथ रहते थे.. पर बाद में पापा और चाचा में लड़ाई के कारण पापा ने अपना अलग मकान बना लिया।
फिर भी हम लोग कभी-कभी घूमने चाचा के घर चले जाया करते थे।

मेरे चाचा की दो लड़कियां थीं.. वो दोनों अभी बहुत छोटी थीं। उनमें से बड़ी वाली करीब 6 साल की थी और छोटी वाली 4 साल की थी। चाचा की शादी को दस साल हो गए थे, अब भी मेरी चाची इतनी कमाल की थीं कि पूछो मत.. उनकी उम्र करीब 28 साल की होगी, वे थोड़ी सांवली थीं.. पर उनका बदन इतना भरा-पूरा था कि मैं तो बस उनके ही ख्वाब देखता रहता था।

चाचा के परिवार से अलग होने के बाद मेरा मन नहीं लगता था। मैं जब भी चाचा के घर जाता था.. तो वहाँ दो तीन दिन रहता ही था।
इस बात को अभी 6 महीने ही हुए थे कि चाचा की गाँव में टीचर की जॉब लगने की खबर आई.. चाची इस बात को सुन कर काफ़ी उदास हो गई पर चाचा उनको ले नहीं जा सकते थे.. क्योंकि उनकी दोनों लड़कियाँ प्राइवेट स्कूल में पढ़ती थीं।

गाँव के स्कूल में चूंकि इंग्लिश मीडियम की पढ़ाई नहीं होती थी इसलिए चाचा ने दोनों लड़कियों और चाची को यहीं दिल्ली में छोड़ दिया। चाचाजी ने गांव जाने से पहले पापा से बोल दिया कि पंकज को यहीं रहने भेज दो।

पहले तो पापा मना करते रहे थे.. पर मम्मी के समझाने पर पापा मान गए।

अब मैं कभी कभी ही अपने घर जाया करता था, यहाँ अपनी चाची की दोनों लड़कियों के साथ खेलता रहता था। उनके स्कूल चले जाने पर मैं अपनी पढ़ाई वगैरह कर लिया करता था और उनको भी पढ़ा देता था।
हम सभी भाई बहन और चाची एक ही रूम में.. और एक ही पलंग पर सोते थे, यह पलंग काफ़ी बड़ा था।

एक दिन मेरी दोनों बहनें रोज की तरह स्कूल गई हुई थीं। मैं रूम में टेलीविजन देख रहा था और बरामदे में चाची नहा रही थीं। मेरी नज़र खिड़की से अचानक चाची की ओर चली गई।
चाची सिर्फ़ ब्लाउज और पेटीकोट में थीं.. उनका पेटीकोट पूरी तरह से भीगा हुआ था, जिससे उनकी नंगी जाँघें और पीछे से पूरी गांड एकदम साफ़ दिख रही थी।

दोस्तो, यह कहानी आप अन्तर्वासना सेक्स स्टोरीज.कॉम पर पढ़ रहे हो।

यह सब देख कर मानो मेरे पूरे जिस्म में करंट सा दौड़ गया, मैं चुपके से खिड़की से चाची को बुरी तरह से घूर रहा था। मेरा लंड मेरे हाथों में था और पूरी तरह खड़ा था।

नहाने के बाद चाची जब रूम में आई.. तो मानो जैसे पूरा रूम खुशबू से महक गया था। मेरा मन कर रहा था जैसे मैं अभी चाची के पूरे बदन को चाट लूँ।

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उस दिन के बाद से मानो दिन रात बस मेरे दिमाग़ में चाची ही घूमने लगी।
अब मुझे रात को नींद भी नहीं आती.. मैं सिर्फ़ बिस्तर पर पड़े पड़े चाची के बारे में ही सोचता रहता था। मैं सोते समय भी उनकी तरफ ही देखा करता था।

उस रूम में बाहर सड़क पर लगे खंबे की बल्ब की रोशनी की वजह से कमरे में थोड़ी रोशनी सी रहती थी। चाची रात में सिर्फ़ ब्लाउज और पेटीकोट में ही सोती थीं, मैं उनको रोज रात को रात भर घूरता रहता था। उनका पेटीकोट उनकी जाँघों से नीचे तक सरक आता था, जिससे उनकी चिकनी जांघें बल्ब की रोशनी में खूब चमकती थीं।
अब तो मैं रोज चुपके से चाची को नहाते हुए देखा करता था और रोज उनके बारे में सोच कर मुठ मारा करता था।

एक रात की बात है.. मैं रोज रात की तरह बिस्तर पर पड़े-पड़े चाची को घूर रहा था.. बाहर से आती हुई रोशनी उनके बदन को रोशन कर रही थी।
ना जाने क्यों.. मेरा मन उस रात को चाची की जाँघ को छूने के लिए बहुत मचलने लगा, मैं अपने आपको रोक ही ना सका और बिस्तर के इस कोने से उठ कर दूसरे कोने पर, जहाँ चाची सो रही थीं.. वहाँ आ गया।

इस वक्त रात के करीब दो बज रहे थे.. कमरे का पूरा माहौल एकदम शांत था। बस मेरे ही दिमाग़ में मानो तूफान सा चल रहा था। नींद तो मानो मेरी आँखों से कोसों दूर थी।

मैं अब चाची के बहुत करीब हो गया था.. मेरी धड़कन मानो मोटर से भी ज़्यादा तेज धड़क रही थी और मेरे हाथ काफ़ी कांप रहे थे। मैंने डरते डरते चाची का पेटीकोट धीरे से उनके जाँघों के ऊपर उठाया.. उनके पेटीकोट ऊपर करते ही एक हल्का सा भभका उनके पेटीकोट के अन्दर से बाहर निकला और मानो एक हल्की सी गर्म खुशबूदार भांप मुझे महसूस हुई।

चाची का पेटीकोट उनके घुटने पर था, मैं उनकी जांघें एकदम साफ देख सकता था, मैंने डरते-डरते चाची की जाँघों को हाथ लगाया और मुझे ऐसा लगा मानो मैंने जन्नत छू ली हो.. उम्म्ह… अहह… हय… याह… कितनी मुलायम थीं उनकी जांघें..

मैंने आज तक कभी किसी महिला या लड़की की जाँघों को नहीं छुआ था, चाची के पटों पर एक भी बाल नहीं थे, पहले तो मुझे उनकी जाँघ को छूने में डर लग रहा था.. पर थोड़ी देर तक उनकी जाँघ को सहलाने के बाद मानो मेरे अन्दर थोड़ा डर कम हुआ।

अब मुझ में थोड़ा साहस आया, तो मैंने उनका पेटीकोट जाँघ से और ऊपर तक कर दिया। अब उनका पेटीकोट उनकी कमर तक आ गया था, मैंने धीरे धीरे अपना हाथ बढ़ाना शुरू किया।

चाची की दोनों जाँघों के जोड़ के अंतिम छोर पर पहुँचने के बाद मुझे कुछ गीला गीला पसीने सा अपने हाथ पर महसूस हुआ, मेरे हाथों में कुछ बाल से भी महसूस हुए।

अचानक मुझे झटका लगा.. चाची ने कोई पेंटी नहीं पहनी थी। मेरा हाथ सीधा उनकी चूत की झांटों से जा लगा था, मैंने धीरे धीरे उनकी चूत पर हाथ लगाया.. उनकी चूत पर काफ़ी बाल थे, मेरे पूरे हाथ में मानो बाल ही बाल आ रहे थे।

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पहले दो चार मिनट तो मैंने चाची की चूत को सहलाया।
दोस्तो.. मैं बता नहीं सकता, कितना मज़ा आ रहा था मुझे! मेरे हाथों में मुझे हल्की सी गर्मी सी महसूस हो रही थी।

मैंने धीरे से उनकी दोनों टांगों को फैला दिया। अब बल्ब की रोशनी में चाची की चूत पूरी दिख रही थी, मेरा दिल अभी भी बहुत तेज़ी से धड़क रहा था, पर मैंने आव देखा.. ना ताव.. चाची की चूत पर अपना मुँह धर दिया और चूत को चाटना शुरू कर दिया।

जैसे ही चाची की चूत को मैंने अपने होंठों से छुआ.. मानो मुझे ऐसा लगा जैसे मैं जन्नत को चूम रहा हूँ। मुझे कुछ नमकीन और खट्टा सा स्वाद लग रहा था।
चाची की चूत पर जो घना बालों का गुच्छा उगा हुआ था.. वो भी मेरे नाक मुँह में घुसा जा रहा था।

अब मैं चाची की चूत को चाटने में पूरी तरह से मशगूल था.. पर उसी वक्त अचानक चाची थोड़ी सी हिलीं।
मेरी फट गई.. मुझे मानो ऐसा लगा.. जैसे किस ने मेरा खून निचोड़ लिया हो।
मुझे काटो तो खून नहीं.. मैं तुरंत ही रुक गया।

चाची ने अपनी दोनों जांघें मोड़ लीं, चाची ने करवट क्या बदली.. चाची को हाथ लगाने की मेरी दुबारा हिम्मत ही ना हुई। फिर मैं अपनी जगह में सोने चला गया, उस रात मुझे मजा तो बहुत आया.. पर मैं थोड़ा डरा हुआ भी था कि कहीं चाची को पता ना चल गया हो और चाची मुझे डांट ना लगाएं या मारे नहीं साथ ही यह भी ये लग रहा था कि कहीं वे मेरे पापा मम्मी से ना बोल दें।

यही सब सोच कर उस रात मुझे बहुत डर लग रहा था। मैंने कभी सच में चूत नहीं देखी थी और ना कभी जाँघों को छुआ था।

अगले दिन चाची मुझसे रोज की तरह ही बात कर रही थीं, उनके व्यवहार में बिल्कुल भी बदलाव नहीं था। मैं समझ गया कि चाची को कल रात के बारे में कुछ भी नहीं पता चल सका है।

उस दिन के बाद मानो मेरी रोज की यही आदत बन गई, मैं रोज रात को चाची की चूत जी भर कर चूसता और फिर अपनी जगह पर आकर मुठ मार कर सो जाता।

ऐसा होते हुए अभी एक हफ़्ता ही गुजरा होगा कि एक रात मैंने चाची के बगल में जगह बनाई और उनके बगल में ही नंगा होकर लेट गया।
उस दिन मानो ऊपर वाले ने भी मेरी सुन ली हो, चाची ने आज चूत साफ की थी और उन्होंने मेरा वाला डियो भी चूत पर लगा रखा था, उनकी चूत से मेरे डियो की मादक खुशबू मानो मेरा मजा दोगुना कर रही थी।

आज मैं चाची के बगल में पूरा नंगा लेटा हुआ था और 69 की पोज़ के साथ चाची की चूत चाट रहा था। अब तो मानो मेरे जिस्म में से डर नाम की चीज़ पूरी तरह से निकल गई थी।

मैंने चाची के हाथों को पकड़ा.. और फिर..

आगे की स्टोरी मेरे अगले भाग में पढ़िए.. और दोस्तों मेरी ये कहानी कैसी लगी.. मुझे ज़रूर बताईएगा।
[email protected]
कहानी जारी है।

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