वासना की धारा- 4

देसी वाइफ सेक्स कहानी में पढ़ें कि सेक्सी बीवी ने अपने पति के दोस्त को रात में अपने घर बुलाया. कुछ डर और कुछ रोमांच लिए वो अपने दोस्त के घर पहुँच गया, फिर …

दोस्तो, मैं समीर आपको देसी वाइफ सेक्स कहानी के पिछले भाग
दोस्त की बीवी से सेटिंग
में एक शादीशुदा मर्द और एक शादीशुदा औरत की बातचीत बता रहा था जिसमें शेखर और धारा अब आपस में बातें करने लगे थे।
यही नहीं, अब धारा ने खुद शेखर से मिलने की इच्छा जाहिर कर दी थी।

मगर ये कहकर धारा ऑफलाइन हो गयी और शेखर ने भी उससे कहा कि वो भी उससे मिलने के लिए व्याकुल है।
शेखर ने मैसेज में धारा से मिलने का पता पूछा और उसके जवाब का इंतजार करने लगा।

अब आगे देसी वाइफ सेक्स कहानी:

शायद शेखर के सितारे उसके साथ थे, थोड़ी ही देर में धारा ने जवाब भेजा- ये मेरा नम्बर है. आप अपने नम्बर से एक मैसेज भेजिए और फिर मेरे मैसेज का इंतज़ार कीजिए. और हाँ, कॉल करने की कोशिश मत कीजिएगा. आपको कहाँ और कैसे आना है ये सब मैं मैसेज के ज़रिए बताती जाऊँगी. अब से सारी बातें मैसेज से ही होंगी.

शेखर- जैसी आपकी इच्छा धारा.
इतना लिख कर शेखर ने तुरंत धारा के दिए हुए नम्बर पर अपने नम्बर से मैसेज भेजा.

उधर से धारा का मैसेज आया और उसने शेखर को फटाफट तैयार होने के लिए कहा.

शेखर झट से उठा और एक नीली जीन्स और सफ़ेद रंग की टी-शर्ट डालकर बढ़िया सा परफ़्यूम मार कर अपने फ़्लैट से बाहर निकल गया.
जाते जाते उसने रघु को कह दिया कि शायद वो आज रात वापस ना आए तो वो खाकर सो जाए.

अपनी बिल्डिंग के नीचे पहुँच कर जैसे ही उसने अपने कार की चाबी से गेट खोलने की कोशिश की तभी धारा का एक मैसेज आया कि अपनी कार से ना आकर मेट्रो पकड़ ले.

शेखर ने वैसा ही किया और धारा से पूछा कि उसे आख़िर आना कहाँ है.
धारा ने उसे रोहिणी मेट्रो स्टेशन आने को कहा.

शेखर को इतने दिनों में दिल्ली के मेट्रो की जानकारी तो हो गयी थी।

मगर फिर भी थोड़े असमंजस और परेशानी के बाद वो रोहिणी मेट्रो स्टेशन तक पहुँच गया.
रास्ते भर शेखर धारा के ख़्यालों में खोया हुआ था.
एक तरफ़ उसे धारा से मिलने और रोमांच से भरे वासना का खेल का जोश था तो दूसरी तरफ़ एक अनजाने डर से भी चिंतित था.

आए दिन इस तरह की खबरें सुना करता था जिसमें इस तरह से लोगों को बेवक़ूफ़ बना कर लूट-पाट और यहाँ तक कि क़त्ल तक की वारदातें भी हुआ करती थीं.

ये सोच-सोच कर शेखर की भी फटी पड़ी थी लेकिन कहीं ना कहीं उसे ऐसा यक़ीन था कि ऐसा कुछ नहीं होगा.
और अगर हुआ भी तो वो भविष्य के लिए एक सबक़ साबित होगा.

रात के क़रीब 9 बज चुके थे।
रोहिणी मेट्रो स्टेशन के नीचे खड़े-खड़े शेखर धारा के मैसेज का इंतज़ार कर रहा था.

थोड़ी देर में धारा का मैसेज आया और उसने शेखर को अपनी बिल्डिंग का पता भेजा जो पास के ही जापानी पार्क से सटा हुआ इलाक़ा था.

शेखर उस पते पर पहुँचा, रात के वक्त बिल्डिंग के आस-पास दो चार लोग ही इधर-उधर घूमते नज़र आ रहे थे.

धारा के दिए हुए पते पर पहुँच कर बिल्डिंग के नंबर और फ़्लैट के नम्बर को ढूँढते हुए शेखर उस फ़्लैट तक पहुँचा जहां शायद धारा रहती थी.

उसका फ़्लैट तीसरी मंज़िल पर सबसे कोने वाला था.
वहाँ पहुँच कर शेखर ने फ़्लैट की घंटी बजाने के बजाए धारा को फ़ोन पर मैसेज किया कि वो आ गया है.

धारा ने भी मैसेज भेजा कि दरवाज़ा खुला है, अंदर आ जाइए.

धड़कते दिल से शेखर ने दरवाज़े को हल्का सा धक्का दिया तो दरवाज़ा खुलता चला गया.

अंदर बहुत ही मद्धम सी नीली रोशनी बिखरी थी लेकिन इतनी मद्धम कि कुछ देख पाना सम्भव नहीं था.

शेखर ने अंदर घुस कर मेन दरवाज़ा बंद कर दिया और वहीं खड़ा रहा.

लगभग 5 मिनट तक ना तो कोई नज़र आया और ना ही किसी की आवाज़ सुनाई दी.

फिर एक हल्की सी आवाज़ आयी- आपकी दाहिनी तरफ़ टेबल पर एक पट्टी रखी है, उसे पहन लीजिए.
ये धारा की आवाज़ थी शायद.

शेखर ने उस मद्धम सी रोशनी में अपनी दाहिनी ओर टटोलते हुए टेबल पर रखी उस पट्टी को ढूँढा.
वो एक हल्के मुलायम चमड़े से बनी चौकोर पट्टी थी जिसके पीछे ताले की तरह का कुछ था.

शेखर ने एक आज्ञाकारी बच्चे की तरह उस पट्टी को अपनी आँखों पर रखा और फिर पीछे की तरफ़ हाथ ले जाकर उसे लॉक कर दिया.
अब शेखर की आँखों के आगे बिल्कुल अंधेरा था.

पट्टी कुछ इस तरह की थी कि वो चाह कर भी उसे निकाल नहीं सकता था और ना ही पहनने वाले को कुछ भी नज़र आता.

शेखर की दिल की धड़कन बढ़ गयी। उसके पैर भी हल्के से काँपने लगे.

उसके मन में कई तरह के मिश्रित विचार आने लगे, कहीं सच में कोई अनहोनी ना हो जाए!
सोचते सोचते लगभग 2 मिनट ही हुए थे कि उसे किसी के कदमों की आहट सुनायी दी और एक भीनी-भीनी सी ख़ुशबू उसे क़रीब आती हुई महसूस हुई.

धीरे-धीरे वो ख़ुशबू बिल्कुल क़रीब आ गयी और शेखर को महसूस हुआ कि कोई उसके ठीक सामने खड़ा है.
ख़ुशबू लेडीज़ परफ़्यूम की थी तो शेखर को थोड़ा तो यक़ीन हुआ कि ये कोई लड़की या औरत ही है.

मगर डर तो फिर भी था या यूँ कहें कि रोमांच था जो शेखर को उत्तेजित कर रहा था.

उधेड़बुन में खोए शेखर के हाथों पर किसी के हाथ का अहसास हुआ. नर्म मुलायम उंगिलयों का स्पर्श शेखर को झकझोर गया, शेखर एकदम से चौंक गया.

“घबराइए मत …ये मैं ही हूँ … धारा !!” धारा ने शेखर के हाथ पर अपना हाथ रखते हुए धीरे से शेखर के कान में कहा.

इतना सुनकर शेखर की जान में जान आयी, उसके अंदर का डर तो चला गया लेकिन अब धारा की मादक आवाज़ सुनकर उसके अंदर की उत्तेजना बढ़ गयी.

धारा ने शेखर का हाथ थामा और उसे अपने साथ चलने का इशारा किया.
“आइए मेरे साथ.” धारा शेखर को धीरे से खींचते हुए किसी कमरे की तरफ़ ले गयी. शायद वो बेडरूम रहा होगा.

अंदर कमरे में पहुंच कर धारा ने शेखर को वहीं खड़ा किया और उससे अलग हो गयी, शेखर को कुछ दिख तो नहीं रहा था लेकिन वो इतना महसूस कर सकता था कि धारा कब उसके क़रीब थी और कब उससे दूर हो रही थी.

शेखर से अलग होकर धारा ने बेडरूम का दरवाज़ा बंद किया जिसकी आवाज़ शेखर के कानों तक भी पहुँची.
दरवाज़ा बंद करने के बाद धारा शेखर के पीछे खड़ी हो गयी और अपने दाहिने हाथ की उंगलियों को शेखर के कान के ठीक पीछे से शुरू करते हुए पूरी गर्दन और धीरे-धीरे उसकी पीठ पर इधर-उधर घुमाने लगी.

“ह्म्म्म्म …. धारा !!” शेखर ने लम्बी साँस ली और बस धारा ही कह पाया.
धारा की उंगलियां पीठ पर घूमते-घूमते शेखर के अंदर के लावे को उछाल मारने पर मजबूर कर रही थी.
उंगलियाँ अब सिर्फ़ पीठ पर ही नहीं बल्कि शेखर की कमर तक भी पहुँच गयी थी.

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मगर ये तो बस शुरुआत थी, और शेखर भी यह जानता था. अब इसके आगे क्या-क्या होगा ये सोच-सोच कर शेखर पागल हुआ जा रहा था.

थोड़ी देर शेखर की पीठ से खेलने के बाद धारा आगे आ गयी और अब उसकी उंगलियां सामने से शेखर के गले और फिर धीरे-धीरे उसके सीने पर चलने लगीं.

शेखर बस मूर्ति के समान खड़ा-खड़ा उस पल का आनंद ले रहा था और अपने काँपते हुए शरीर को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहा था.
अनायास ही शेखर के हाथ उठने लगे और उसने सामने खड़ी धारा के शरीर का स्पर्श पाने की लालसा में धारा की तरफ़ हाथ बढ़ाया.

धारा ने शेखर का हाथ अपनी ओर बढ़ते हुए देख लिया था।
शायद धारा की आँखों पर पट्टी नहीं थी.

धारा शेखर की मनोदशा समझ चुकी थी, उसने शेखर का हाथ अपने दोनों हाथों से थाम लिया और धीरे से उसकी हथेलियों को थाम कर अपने कंधों पर रख दिया.

उफ़्फ़ … शेखर का हाथ मानो किसी रेशम सी चिकनी जगह पर रखा गया हो, कंधे की नर्मी ने शेखर के हाथों को फिसलने पर मजबूर कर दिया.

उसकी उंगलियाँ पूरे कंधे पर फिसलने लगीं और तब जाकर शेखर को अहसास हुआ कि शायद आज धारा उसी तरह के ब्लाउज़ में थी जैसा उसने कल उसे अपने लैपटॉप की स्क्रीन पर देखा था.

मतलब कंधों पर बस एक डोरी से ज़्यादा कुछ भी नहीं था लेकिन एक ओर साड़ी का आँचल ज़रूर था.
शेखर के हाथ रखते ही धारा के मुँह से भी एक ठंडी सी आह निकली.

शेखर के मर्दाना हाथों की गर्माहट से धारा का बदन भी उतना ही उत्तेजित हो रहा था जितना कि शेखर का हुआ जा रहा था. शेखर ने धारा के कंधों का अच्छे से मुआयना करने के बाद अपनी उंगलियों को उसके चेहरे की तरफ़ बढ़ा दिया।

धीरे से धारा की ठुड्डी से लेकर उसके गालों और उसके पूरे चेहरे पर अपनी उंगलियाँ फिराते-फिराते धारा के होंठों पर अपनी उंगलियां रख दीं. धारा के चेहरे को छूने के बाद शेखर को पता चला कि उसने सच में कोई पट्टी नहीं बांध रखी है।

यानि धारा उसे देख सकती थी.
मतलब यह हुआ कि धारा शेखर के गठीले बदन को देख भी सकती थी और उसे महसूस भी कर सकती थी मगर शेखर अब भी बस उसके शरीर की गर्मी ही महसूस कर सकता था लेकिन उसे देख नहीं सकता था.

खैर यही रोमांच तो चाहिए था शेखर को!

धारा के होंठों पर उंगलियाँ फेर कर शेखर को महसूस हुआ कि उसके होंठ बिल्कुल गुलाब की नाज़ुक पंखुड़ियों की तरह से थे, जिसका रसपान करने को हर मर्द आतुर हो जाए.

शेखर ने कुछ देर तक धारा के होंठों को अपनी उंगलियों से छेड़ा फिर अपनी एक उंगली को धारा के होंठों के बीच रख कर होंठों के अंदर के हिस्से की नर्मी को महसूस करना चाहा.

धारा ने शेखर की उंगली को बड़े ही प्यार से अपने होंठों के बीच ले लिया और क़ुल्फ़ी की तरह चूसते हुए पूरी उंगलियों को मुंह के भीतर लेकर चुभलाने लगी.

हाय … शेखर को ऐसा लगा मानो धारा उसे अपने चूसने की कला का परिचय दे रही हो!
शेखर ये सोच कर और भी रोमांचित हो गया कि जब धारा उसकी उंगलियों को इतने प्यार से चूस सकती है तो शायद वो उसके लंड को भी आज चूस कर उसे जन्नत का सुख देगी.

यह विचार आते ही शेखर का दूसरा हाथ धीरे से धारा के चेहरे से सरकता हुआ पहले तो उसके कंधे तक आया फिर धीरे-धीरे नीचे की ओर सरकते हुए धारा के उन्नत विशाल उभारों पर आ गया.

“ह्म्म्म … आह्ह्ह!” शेखर का हाथ अपने उभारों पर महसूस करते ही धारा ने शेखर की उंगली को अपने होंठों से आज़ाद कर दिया और एक सिसकारी भरी.

शेखर का दूसरा हाथ भी ख़ाली हो चुका था, अपने दाहिने हाथ की हथेलियों को धारा की चूचियों पर फिराते हुए शेखर ने अपने दूसरे हाथ से धारा की कमर को पकड़ कर अपने क़रीब खींचा और उसे अपने सीने से सटा लिया.

अब हालात यह थे कि शेखर का एक हाथ धारा की कमर को थामे हुए था और दूसरा हाथ धारा की चूचियों और अपने खुद के सीने के बीच फँस सा गया था.

चूचियों पर रखी हुई हथेली इतनी मज़बूती से फंसी हुई थी कि चाह कर भी शेखर अपनी उंगलियों या फिर हथेलियों से धारा की चूचियों को दबा या सहला नहीं पा रहा था.

मौक़े की नज़ाकत को देखते हुए शेखर ने धारा की चूचियों और अपने सीने के बीच फँसे हुए हाथ को धीरे से सरका कर बाहर निकाला और धारा को अपनी बांहों में पूरी तरह से भरके अंदाज़ा लगाते हुए अपने होंठ धारा के होंठों से मिला दिए.

दोनों की गर्म-गर्म साँसें एक दूसरे की साँसों से मिलने लगी, एक दूसरे के होंठों को दोनों ने बड़ी तन्मयता से धीरे-धीरे चूमना शुरू किया और फिर वो चूमना चूसने में बदल गया.

जितनी शिद्दत से शेखर धारा के होंठों का रस चूस रहा था इतनी ही शिद्दत से धारा भी शेखर के होंठों का रसपान कर रही थी.

धीरे-धीरे दोनों के होंठ खुलते चले गए और अब उन दोनों की ज़ुबान एक दूसरे के मुँह का रास्ता तलाश कर आपस में टकराने लगे.

सबसे पहले शेखर ने धारा की जीभ को अपने होंठों के बीच लिया और आइसक्रीम की तरह चूसने लगा और फिर यही सिलसिला धारा ने भी दोहराया.

इस दरमियान दोनों के हाथ एक दूसरे के बदन को सहला रहे थे.
दोनों एक दूसरे के होंठों को या फिर यूँ कहें कि एक दूसरे की जीभ को छोड़ना नहीं चाह रहे थे।

चूसने और एक दूसरे की लार को एक दूसरे के मुंह में खींच कर पीने का सिलसिला जारी था.

इसी बीच शेखर ने धारा के बदन से अपनी पकड़ थोड़ी ढीली की ताकि वो उसकी चूचियों का मर्दन कर सके.

शेखर ने धारा के बदन को थोड़ा सा अलग करते हुए एक हाथ से उसके कंधे पर टिके साड़ी के आँचल को सरका कर नीचे गिरा दिया. अब धारा के शरीर के ऊपरी भाग पर बस वो बिना बाजू का ब्लाउज़ ही था।

अब शेखर ने अपनी दोनों हथेलियों को आगे ले जा कर धारा की दोनों चूचियों को क़ैद कर लिया.

शेखर रोमांच से इतना भरा हुआ था कि उसने लगभग अपनी पूरी ताक़त से धारा की चूचियों को मसल ही दिया.

“आह्ह्ह … शे…शेखर !!” अचानक से अपनी चूचियों को बेदर्दी से मसले जाने पर धारा ने अपना मुँह शेखर के मुँह से छुड़ा कर एक आह्ह भरी और फिर अपनी गर्दन को पीछे की तरफ़ झुका दिया.

धारा की सिसकारी और दर्द भरी आह्ह सुनकर शेखर को भी अहसास हुआ कि शायद जोश-जोश में उसने कुछ ज़्यादा ही ज़ोर से धारा की चूचियाँ मसल दी थीं.

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खैर उसने अपना काम जारी रखा और अब थोड़ा हल्के हाथों से धारा के विशाल उभारों का मज़ा लेने लगा.
साथ ही अब उसने धारा के गले और उसके कान की लौ को अपने होंठों से चुभलाना शुरू किया.

धारा बस ठंडी-ठंडी आहें भरे जा रही थी और शेखर के मर्दन का मज़ा ले रही थी.
उसने शेखर के सर को अपने दोनों हाथों से पकड़ लिया था और अपनी उंगलियाँ उसके बालों में फिरा-फिरा कर वासना के इस खेल का पूरा आनंद ले रही थी.

शेखर काफ़ी देर तक धारा की चूचियों को ब्लाउज़ के ऊपर से ही मसलता रहा.
हथेलियों में भरने से उसे इतना तो अंदाज़ा हो चुका था कि धारा की चूचियों का साइज़ 34 से कम नहीं था; शायद 34 और 36 के बीच का कह लीजिए.

अब वो उन उभारों को बिना किसी दीवार के अपने हाथों में महसूस करना चाहता था।
उसने अपनी उंगलियों से ब्लाउज़ का बटन ढूँढने की कोशिश की.

कभी वो अपनी उंगलियों से आगे की तरफ़ टटोलता तो कभी पीछे ले जाकर पीठ की तरफ़ बटन ढूँढता.

उसकी बेचैनी बढ़ती जा रही थी. उसने अब धारा को चूमना भी छोड़ दिया था और बेसब्री से उसके ब्लाउज़ को निकाल फेंकने की तरकीब ढूँढ रहा था.

धारा हंसी- हे हेह्ह … इसमें बटन नहीं है जनाब!

फिर धारा ने शेखर की उंगलियाँ पकड़ीं, दोनों हाथों की एक-एक उंगली को पकड़ कर धारा ने अपने बगलों के ठीक नीचे ब्लाउज़ के अंदर कर थोड़ा ऊपर की तरफ़ धकेल दिया और खुद अपनी बांहें ऊपर कर लीं जैसे कि हम कोई बनियान उतारते वक्त करते हैं.

मतलब धारा ने कुछ इस तरह का ब्लाउज़ पहना था जिसमें बटन नहीं थे और वो एक स्पोर्ट्स ब्रा की तरह ऊपर से डाल दिए जाते हैं.

शेखर को अब समझ आ चुका था कि धारा की चूचियों को सजीव रूप में बिना किसी दीवार के भोगने के लिए उसे उसके ब्लाउज़ को ऊपर सरका कर निकलना पड़ेगा।

उसने भी बिना कोई देरी किए धारा के ब्लाउज़ को ऊपर की ओर सरका कर पूरी तरह से बाहर निकाल दिया.

मगर इससे पहले कि शेखर उन विशाल चूचियों को अपनी हथेलियों में क़ैद करे, धारा उसके सीने से लिपट गयी।
मानो वो शेखर से अपनी चूचियों को छुपाना चाह रही हो.

शेखर उसकी इस अदा पर मुस्करा दिया.
फिर उसने धीरे से धारा के कानों में फुसफुसा कर कहा- अजी वाह … आँखें आपने मेरी बंद करवा रखी हैं और इस बात से शर्मा रही हैं कि कहीं मैं इन्हें देख ना लूँ.
शेखर ने उलाहना देते हुए मुस्करा कर कहा.

“शैतान …”
धारा ने बस धीरे से अपनी मादक आवाज़ में शेखर के सीने से थोड़ा अलग होते हुए उसके सीने पर मुक्का मारते हुए कहा.

अगर उस वक्त शेखर की आँखें खुली होतीं तो शायद वो धारा की इस अदा पर मर मिटता.
खैर शेखर मुस्कराता हुआ धारा को एक बार फिर से खुद से लिपटाते हुए उसके होंठों का रसपान करने लगा और धीरे से अपने दोनों हाथों से उसकी चूचियों को पूरी तरह से थाम लिया.

रेशम सी मुलायम मगर साथ ही अंदर से कठोर चूचियों को थाम कर शेखर ने धारा के होंठों को चूसना शुरू किया.
धारा ने भी अपनी चूचियों पर शेखर के नंगे हाथों का स्पर्श महसूस करके उतने ही जोश से शेखर के चुम्बन का जवाब देना शुरू किया.

शेखर ने धीरे से अपने अंगूठे और दूसरी उंगलियों के बीच धारा की चूचियों की घुंडी को पकड़ लिया और आहिस्ते-आहिस्ते मसलने लगा.
चूचियों की घुंडियों को मसले जाने से धारा के शरीर में झुरझुरी सी हुई और उसने शेखर के होंठों को अपने दांतों से पकड़ कर लगभग काट सा लिया.

शेखर ने किसी तरह अपने होंठ छुड़ाए और एक झटके से धारा को पीछे की तरफ़ घुमा दिया.

अब धारा की पीठ शेखर के सीने से और विशाल नितम्ब शेखर के लंड से चिपक गए.

शेखर मन ही मन सोचने लगा कि काश इस वक्त आँखे खुली होतीं तो वो इस पोजिशन में धारा को आइने के सामने देखते हुए उसकी चूचियों से खेलता और मज़े लेता.

मगर धारा को बिना देखे उसके मख़मली शरीर का आनंद उठाने का रोमांच ही इस वक्त शेखर के लिए काफ़ी था.
शेखर का लंड जो अब तक अकड़ कर किसी स्टील की रॉड की शक्ल ले चुका था वो धारा के विशाल नितम्बों को कुरेदने लगा था.

धारा की साड़ी और साये की दीवार भी शेखर के लंड को धारा की गांड की दरार को ढूँढने से रोकने में असमर्थ ही साबित हो रहे थे.

शेखर का लंड अपने पूरे उफान पर था और कपड़ों के साथ धारा की गांड में घुसने की नाकाम कोशिश कर रहा था.
अब भी शेखर के दोनों हाथ धारा की चूचियों को मसलने में व्यस्त थे.

और उधर धारा ने अपनी बांहें ऊपर करके शेखर के गले में उल्टी तरफ़ से डाल दी थीं और शेखरे के बालों को खींच कर अपनी उत्तेजना का इजहार कर रही थी.

अब शेखर ने अपने कदम आगे बढ़ाने की सोची और धारा की एक चूची को अपने बाएँ हाथ से मसलते हुए अपने दाएँ हाथ को उसके पेट पर घुमाने लगा.

जल्द ही उसे धारा की नाभि मिल गयी और वो अपनी एक उंगली धारा की नाभि में डालकर ऐसे सहलाने लगा मानो वो धारा की नाभि ना होकर धारा की चूत का भगनासा हो.

थोड़ी देर इसी तरह धारा की नाभि से खेलने के बाद शेखर ने अपनी उंगलियों को धारा की कमर पर बंधी साड़ी के अंदर सरकाना शुरू किया.
धारा की नाभि और चूत के बीच का भाग जिसे आम भाषा में पेड‌‍़ू भी कहते हैं, शेखर की उंगलियों का अहसास पाते ही काँपने से लगे.

शेखर ने अब धीरे से अपनी उंगलियों को साड़ी और साये की गाँठ को बिना खोले ऊपर से नीचे की तरफ़ सरकाते हुए उस जगह प्रवेश करवाया जहां से जन्नत का रास्ता खुलता है.

अब शेखर की उंगलियां धीरे-धीरे सरकते हुए ठीक धारा की चूत के ऊपर पहुँच चुकी थीं.
धारा ने अंदर कोई पैंटी नहीं पहनी थी।

शेखर की पूरी हथेली धारा की गद्देदार चूत के ऊपर ठहर गई थी. शेखर ने धारा की चूत को अपनी मुट्ठी में भर लिया.

“उफ़्फ़ … शेखर … ये क्या कर दिया तुमने!” अपनी चूत को यूँ शेखर की हथेली में पकड़े जाने पर धारा की कामुक सिसकारी निकल गयी.

धारा की चूत ने अब तक के खेले गए वासना के खेल से द्रवित होकर अपना काम रस छोड़ना शुरू कर दिया था. शेखर की हथेली उस चिकने काम रस से चिपचिपा गयीं थी।

इसका एक फ़ायदा ये हुआ कि शेखर की हथेलियों की हल्की सी हरकत से धारा की चूत अपने आप अपने होंठों से चिपक कर फिसलन का अहसास दिला रही थी. शेखर ने उसी अवस्था में धारा की चूत को हथेलियों से मसलना जारी रखा.

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देसी वाइफ सेक्स कहानी का अंतिम भाग: वासना की धारा- 5