पड़ोसन भाभी उनकी सहेली और बेटी को चोदा-1

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    पड़ोसन भाभी, उनकी सहेली और बेटी को चोदा-2

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लेखक की पिछली कहानी: मामी को रिटर्न गिफ्ट: रसीली चुदाई

“प्लीज अंकल अपना वाला दिखाइये न!”
“क्या दिखाऊं?”
“वही लुंगी के नीचे वाला केला.”
“चल हट … तुम मेरी बेटी जैसी हो … यह सब मुझसे नहीं होगा.”
“प्लीज अंकल, प्लीज मान भी जाओ न … क्यों लड़कियों की तरह नखरे दिखा रहे हो?”

“क्यों तुमने किसी मर्द का अभी तक देखा नहीं है क्या?”
“प्लीज अंकल दिखा दो न … देखे तो बहुत हैं … रेल से गुजरते समय रेल लाइन के किनारे सड़क किनारे … कितने गिनाऊं … पर मैं अभी हाथ में लेकर महसूस करना चाहती हूँ. मेरी सभी सहेली कितनी बातें करती हैं कि उसे छूने से ही शरीर में बिजली दौड़ जाती है … पूरे शरीर में झुरझुरी सी होने लगती है. वे लोग अब तक कितनी बार अन्दर करवा चुकी हैं. … और मुझे केवल उंगली करके ही संतुष्ट रहना पड़ता है.”

“मैंने कहा न … तुम मेरी बेटी जैसी हो. ये सब मुझसे नहीं होगा.”
वो मेरे से लिपटते हुए कहने लगी- वो तो पक्का है.

मैं उसकी तरफ सवालिया निगाहों से देखने लगा.
वो मुझे आंख मारते हुए बोली- जब आप मेरी माँ को पेलते हैं … तो उस रिश्ते से आप मेरे क्या हुए?
मैं हक्का-बक्का सा उसकी ओर देखने लगा. एक बार तो मैं कांप सा गया.

“कब देखा?”
वो बोली- अब बनिए मत … मैं सब देख चुकी हूँ. एकाध बार नहीं … कई बार देखा है. अब जल्दी से आप मुझे केला दिखाते हैं … या भांडा फोडूं?
मैं अपने सारे अस्त्र उसके सामने डालते हुए फिर से पूछा- पहले ये बताओ कि तुमने कब देखा?
मेरी कमर के चारों तरफ हाथ डालते हुए … और अपने ओर खींचते हुए उसने कहा- कई बार.

वो मेरे जिस्म से चिपक कर खड़ी थी. मैंने न चाहते हुए भी उसे कमर के चारों तरफ से हाथों से घेर कर अपने जिस्म से जकड़ लिया.
फिर कहा- आगे तो बोलो?
उसने बोलना जारी किया- जिस दिन पहली बार आपके होंठ सूजे हुए दिखे थे, उसी दिन समझ गई कि मम्मा का दिल आप पर आ गया. मुझे गुस्सा तो बहुत आया था, पर मेरी एक सहेली ने समझाया था कि जिस तरह भूख लगने पर लोग खाना खाते हैं … उसी तरह से यह भी एक भूख है. अभी तुम चुपचाप उन लोगों पर नजरें रखो, बाद में जब तुम्हारी चूत में आग लगेगी … तो ये मर्द काम में आएगा.

मैंने उसकी तरफ फिर से देखा.

वो अपनी ही रौ में मस्त होते हुए कह रही थी- मैंने अपनी सहेली से पूछा कि काम में आएगा से क्या मतलब? तब उसने कहा कि मेरी चूत में आग लगी थी … तो मैंने अपने चचरे भाई से ही करवा लिया था. उसकी इस बात से मुझे बड़ी दिलासा मिली और उसके बाद से मैंने आप दोनों के ऊपर निगरानी रखना शुरू कर दी.
मैंने कहा- फिर?

वो- पापा के नहीं रहने पर जब भी आप आते, तो मैं पढ़ने का बहाना बना कर किसी सहेली के यहां चली जाती. पर थोड़े देर के बाद ही पैरों से बिना आवाज निकाले ऊपर छत पर चली जाती और वहीं पर बड़ी मेहनत से बनाए एक सुराख से आप दोनों की रासलीला देखती.

वह बोलती रही- उस समय मैं अपनी चूत को उंगलियों से ठंडा कर लेती. उसी में मुझे अपनी सील पैक चुत को उंगलियों से खोलना पड़ा. अपनी सील टूटने के बाद जब मैं झड़ी, तब मैंने मम्मा के चेहरे पर आई सुकून महसूस किया. साथ ही दिल से मैं आपको धन्यवाद भी देने लगी. उसके बाद मुझे लगा कि आप मेरे लिए भी सेफ हो. अगर मैं आपसे संबंध बना भी लूँ, तो कोई शक नहीं करेगा. बस मैं एक बार ये जानना चाहती हूँ कि यह कैसा एहसास होता है.

इतना कहते हुए उसने मुझे बेड पर ठेल दिया.

वो मेरे सामने वो एक एक कर सभी कपड़े उतारने लगी. फिर वो केवल ब्रा पेंटी में रह कर मेरे बगल में बैठ गई. उसने एक एक कर मेरे सारे कपड़े उतरवा दिए. मेरे सारे कपड़े उतरते ही मेरा लंड उसके सामने था … जिसे देख कर वो थोड़ी निराश हुयी, जो सोते हुए किसी बच्चे का जुज्जी की तरह लग रहा था.

वो हैरान होते हुए पूछ बैठी- अरे अंकल इतना छोटा … पर माँ कैसे संतुष्ट हो जाती हैं?
मैंने कहा- हां सही बात है. अब तो जिद छोड़ दो.
लेकिन वो जिद कर बैठी और बोली- नहीं … जब माँ इतने छोटे केले से संतुष्ट हो सकती हैं … तो मैं भी संतुष्ट हो जाऊंगी. अब आए हैं, तो इसी को अन्दर करवा के रहूँगी.
मैंने बोला- अच्छा चलो थोड़ा सहला दो.
“वो तो करूंगी ही … पर मुझे निराशा हाथ लगी.”

ये कहते कहते वो मेरे लंड को हाथ में लेकर सहलाने लगी. उसके नर्म मुलायम हाथ के स्पर्श मात्र से ही लंड अंगड़ाई लेने लगा. लंड खड़ा होते होते उसके हथेली से बाहर निकल गया. मोटाई बढ़ कर उसकी मुट्ठी से बाहर हो गया. जिसे देख कर उसकी आंखों में चमक आ गई.

वो बोली- वॉउ … कितना बड़ा हो रहा है … अब तो सचमुच मजा आने वाला है. मुझे तो इसकी खूबी पता ही नहीं था कि यह इतना बड़ा भी होता है. खूब दर्द होगा, पर तभी तो चुत की खुजलाहट शांत होगी.
मैंने पूछा- तुम्हें कैसे पता कि दर्द होता है?
वो बोली- पहले ही कहा न कि मेरी सहेलियां एक्सपर्ट हो चुकी हैं, वही सब बताती हैं और मुझे बुद्धू कहती हैं. वे यह भी कहती हैं कि इतनी बड़ी हो गयी हो, पिछवाड़े में खिलौना उपलब्ध है … फिर भी अभी तक स्वाद नहीं चखा है. सो आज फैसला करके आयी थी कि आपसे लंड अन्दर करवा कर ही रहूँगी.

वो मेरे लंड के साथ खेलने लगी. कभी लंड के चमड़ी को ऊपर नीचे करती और पूछती भी कि अंकल दर्द तो नहीं हो रहा है न?

फिर कभी लंड चूमती, कभी चूसती, कभी ब्रा के ऊपर से ही अपनी चूची पर लंड रगड़ रही थी. वो मेरे लंड के साथ खेल रही थी और मैं ख्यालों में फ्लैश बैक में चला गया था.

ये चार पाँच साल पहले की बात है. मेरी नयी नयी नौकरी लगी थी. जिस मोहल्ले में मैंने किराये का मकान लिया था, वो करीब 20-25 मकानों का मुहल्ला था. बीच में एक सड़क, उसके दोनों ओर बसे 10-12 मकान … छोटी सी दुनिया. उस समय तो मेरी शादी भी नहीं हुई थी. दो रूम का मकान और अकेला आदमी. पर गृहस्थी के सारे सामान धीरे धीरे जुटा लिए थे.

मुझे याद है, वो अक्टूबर का महीना था, शाम का समय. यह महीना कुछ इस तरह के मौसम का होता है कि कभी सर्दी लगती है कभी गर्मी. मतलब एक दूसरे पर चढ़े और फंसे हुए.

मैं लॉन में टहल रहा था कि एक बच्चे के शोर के कारण मैं सड़क पर दौड़ कर आया, तो देखा कि एक लड़की भागती हुयी मेरी तरफ आ रही थी और दो कुत्ते उसका पीछा कर रहे थे.

मैंने अपने बगल में पड़े एक डण्डे को उठाया कि तब तक वो लड़की मेरे करीब आ चुकी थी. एक कुत्ता उसे काटने के लिये छलांग लगा चुका था कि तभी मैंने उस लड़की को पकड़ कर अपनी ओर खींच लिया और दूसरे हाथ से डण्डे का सटीक प्रहार कर दिया. डंडा उस कुत्ते के पीठ पर पड़ा … तो दर्द से बिलबिला उठा लेकिन तब तक दूसरा कुत्ता वार की तैयारी कर रहा था.

मैं लड़की को पकड़े जल्दी से अन्दर की ओर भागा. लॉन का गेट बंद किया और दो तीन छलांग में घर के अन्दर आ गया. तब तक दोनों कुत्ते भी लॉन के अन्दर कूद कर आ गए और लगातार भौंकते रहे. अब हम दोनों सुरक्षित थे.

मैंने औपचारिकता बस केवल उसका नाम पूछा, तो वो बोली- पिंकी.
वो बोली- सर, आप तो अंकल लगते नहीं हैं … मैं आपको क्या बोलूं?
मैंने कहा- कोई बात नहीं अंकल ही बोलो … मुझे अच्छा लगेगा.
वो बोली- अंकल बाथरूम किधर है … डर से मैं थोड़ी गंदी हो गयी हूँ.
मैंने उसे बाथरूम दिखाकर कहा- शाम का समय है … ठंडे पानी से मत नहाना.
मैंने गीजर ऑन करते हुए कहा- थोड़ा रुक जाना … पानी को गर्म हो जाने देना.

पिंकी ने अन्दर जा कर एक एक कपड़ा उतार दिया और बाथरूम के बाहर रख दिए. उसने अन्दर से पूछा- अंकल क्या आपका साबुन लगा लूं …
मैं कहा- हां.
“पर साबुन है किधर?”
मैंने पूछा- क्या मैं अन्दर आ जाऊं?

उसने दरवाजा खोल दिया, तो मैं अन्दर आकर बताने लगा. वो पूरी नंगी दरवाजे के पीछे से छुप कर देख रही थी.

मैंने अपनी अलमारी से तौलिया टी-शर्ट और बरमूडा लाकर उसे दे दिया और कहा- बाहर कपड़े रख दिए हैं, बाहर आकर इसे पहन लेना, मेरे पास फिलहाल यही हैं.

उसने सर बाहर निकाला, तो मैंने उसके बाल सहलाते हुए कहा- घबराओ नहीं, मैं कोई गलत फायदा नहीं उठाऊंगा.
वो बोली- अंकल मेरे पास दिखाने को कुछ नहीं है … बस गंदी हो गयी हूँ. मैं तो बस यह सोच रही थी कि आप क्या सोच रहे होंगे. अंकल, प्लीज़ मेरी मम्मी को फोन करके यहीं बुला लीजिये.

मेरे पूछने से पहले ही उसने अपने घर का फोन नम्बर दे दिया.

मैंने फोन किया, तो उधर से स्त्री की आवाज आयी. उनसे मैंने कहा- आपकी बेटी मेरे घर पर है.
पता पूछने पर मैंने बताया कि जिसे आप लोग छुट्टा बैल कहते हैं, वहीं पर आ जाइए.

उस समय तक शादी नहीं होने की वजह से औरतें इसी नाम से मेरे बारे में आपस में बात किया करती थीं … ये मुझे मालूम था.

वे चिंतातुर होते हुए पूछने लगीं- वो वहां क्या कर रही है?
मैंने इतना ही कहा- आप आ जाएं.

इतने समय में मेरे मकान के आगे आठ दस आदमी औरत खड़े हो गए. सभी ने लाठी डण्डे लेकर मेरे लॉन में आकर उन कुत्तों को भगा दिया. तब तक पिंकी की मम्मी भी आ चुकी थीं. पूरा समाचार तो घर के बाहर ही मिल चुका था, सो उन्होंने दरवाजा खटखटाया.

मैंने डरते हुए पूछा- कुत्ते किधर गए?
तो वो बोलीं- भाग गए.

मैं दरवाजा खोल दिया. दरवाजा खुलते ही उनके साथ पूरा महिला बटालिन भी अन्दर आ गई.

“पिंकी कहां है?”

मैंने बाथरूम की तरफ इशारा कर दिया.

बाथरूम के बाहर उसके कपड़े देख कर जोर से बोलीं- लगता है डर कर उसने कपड़े खराब कर लिए.

इतने में पिंकी भी नहा कर बाहर आ गयी. वो मेरी लाल टी-शर्ट और काला बरमूडा पहने हुयी थी. टी-शर्ट उसके घुटनों तक आ रही थी और बरमूडा तो समझो पूरा पजामा ही था. उसकी मम्मी शांति, उसके कपड़े उठा कर ले जाना चाह रही थीं.

तो मैंने कहा- यहीं साफ कर लीजिए.

वो हां में सर हिलाते हुए बाथरूम में पिंकी के कपड़े साफ करने घुस गईं.

पिंकी मेरे बगल में आकर बैठ गयी थी. मैंने उसे गर्म गर्म कॉफी दी और कहा- मुझे बस यही बनाना आता है, इसे पी लो … तुम्हें अच्छा लगेगा.

पर बाकी की औरतों ने मेरी टांग खिंचाई शुरू कर दी. उन सभी के द्विअर्थी प्रश्न थे, जिन्हें मैं समझ कर भी नासमझ बना हुआ था.

एक- भाई साहब अभी तक आप कुंवारे हैं?
“जी …”
दूसरी- कॉलेज में भी कोई गर्ल फ्रेंड नहीं थी?
“नहीं … मैं अपनी शक्ल आइने में देखता हूँ, चेहरे पर चेचक के दाग, आवाज भैंस जैसी, बाल भी चिंपाजी जैसे खड़े … मेरी इस शक्ल पर कौन लड़की भला फिदा हो सकती है?”
तीसरी बोली- लगता है भाई साहब का सीलपैक धागा अभी तक टूटा नहीं है.
“जी … मैं कुछ समझा नहीं?”

सभी औरतें मुँह दाब कर हँस पड़ीं.

चौथी- अच्छा भाई साहब इतने जानवरों वाले गुण आप में हैं … तो यह भी बता दीजिये कि एकाध गुण घोड़ा वाला भी है कि नहीं … हम लोगों को वही गुण चाहिए होता है … शक्ल का क्या आचार डालेंगी.
उसके प्रश्न का मतलब समझते हुए मैंने भी कहा- जी … मैं सुबह एक किलोमीटर दौड़ता हूँ.

सभी औरतें खिलखिला कर हँस पड़ीं और मैं मूर्ख दिखते जैसे ऐसे बैठा रहा … जैसे मैं कुछ समझा ही नहीं था.

मेरी इस चुदाई की गर्मी से लबरेज सेक्स कहानी में आपको कितना मजा आ रहा है, प्लीज़ मुझे मेल करके जरूर बताएं.
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कहानी जारी है.

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